प्रकृति के हर मौसम में बदलाव आता है और शरीर भी इस बदलाव को महसूस करता है। आयुर्वेद में इसे ‘ऋतुचर्या’ कहा जाता है। यानी हर ऋतु के हिसाब से अपनी दिनचर्या, खानपान और रहन-सहन को बदलना। जो इंसान ऋतुचर्या को समझकर जीता है, उसकी इम्युनिटी मजबूत होती है और मौसम के बदलाव से होने वाली बीमारियाँ दूर रहती हैं।
🌿 ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) में जीवनशैली
गर्मियों में शरीर का पित्त दोष बढ़ जाता है। इसलिए ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थ जैसे – दही, छाछ, बेल का शरबत, नारियल पानी और हरी सब्ज़ियाँ खानी चाहिए। हल्के और आरामदायक कपड़े पहनें और धूप से बचाव करें। ज्यादा हैवी फूड और तली-भुनी चीज़ों से दूरी बनानी चाहिए।
🍂 वर्षा ऋतु (बरसात) में जीवनशैली
बारिश के मौसम में वात दोष सक्रिय हो जाता है। इस समय हल्का, सुपाच्य और गरम भोजन जैसे – मूंग दाल, खिचड़ी, अदरक वाली चाय, काढ़ा आदि लेना फायदेमंद है। पानी को उबालकर ठंडा करके पिएँ, ताकि पाचन तंत्र मजबूत रहे।
❄️ शरद ऋतु (सर्दी की शुरुआत)
इस मौसम में पित्त दोष शांत होता है। शरीर को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए पौष्टिक आहार जैसे – घी, ड्राई फ्रूट्स, हल्दी वाला दूध, बाजरे की रोटी और गुड़ का सेवन ज़रूरी है। व्यायाम और सूरज की हल्की धूप शरीर के लिए वरदान है।
🌬️ हेमंत और शिशिर ऋतु (सर्दी के ठंडे दिन)
यह समय शरीर की ताकत बढ़ाने का है। घी, दूध, सूखे मेवे और गरम मसाले जैसे दालचीनी, इलायची का सेवन लाभकारी होता है। ठंड से बचने के लिए ऊनी कपड़े पहनें और सूर्य की धूप में समय बिताना शरीर के लिए बहुत उपयोगी है।
🌸 वसंत ऋतु (बसंत का मौसम)
इस मौसम में कफ दोष बढ़ता है, जिससे सर्दी-जुकाम और एलर्जी हो सकती है। ऐसे में हल्का भोजन, नीम की पत्तियाँ, हल्दी और त्रिकटु चूर्ण जैसी चीज़ें शरीर को शुद्ध और संतुलित रखती हैं। साथ ही योग और प्राणायाम से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
👉 निष्कर्ष:
आयुर्वेद में ऋतुचर्या का पालन करना स्वास्थ्य के लिए एक बहुत ही सरल लेकिन प्रभावशाली नियम है। यह आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को नैचुरल तरीके से बढ़ाता है और आपको हर मौसम में बीमारियों से बचाता है। मौसम के हिसाब से जीवनशैली बदलना, आपके स्वास्थ्य में स्थायी सुधार लाता है।
स्वस्थ रहने की इस कला को अपनाएं और प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर एक हेल्दी लाइफ जिएं। 🌿☀️🌧️❄️

